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मां सिद्धिदात्री की कथा

  मां सिद्धिदात्री – नवरात्रि के पावन अवसर पर मां आदि शक्ति की सिद्धि दात्री रूप की उपासना की जाती है   मां की उपासना से सभी सिद्धियां तथा तथा सभी सुखो की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के नवे मां आदि शक्ति के सिद्धिदात्रि स्‍वरूप की उपासना की जाती है ये सभी प्रकार की सिद्धि देने वाली होती है नवरात्रि के नवे दिन इनकी पूर्ण शास्‍त्रीय विधान से पूजा करने पर पूर्ण निष्‍ठा के साथ पूजा करने पर साधक को सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्‍त होती है साधक के लिए ब्रम्‍हाण्‍ड में कुछ भी असाध्‍य नहीं रह जाता है ब्रम्‍हाण्‍ड पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामार्थ्‍य उसमें आ जाती है।   मार्कण्‍डेय पूराण के अनुसार अणिमा   महिमा   गरिमा   लघिमा   प्राप्ति   प्राकाम्‍य ईशित्‍व   और वशित्‍व   ये आठ प्रकार की सिद्धियां होती हैं।   ब्रम्‍हवैवर्तपुराण के अनुसार श्री कृष्‍ण जन्‍म खण्‍ड में इनकी संख्‍या अठारह बताई गई है 1 . अणिमा   2 . लघिमा   3 . प्राप्ति   4 . प्राकाम्‍य   5 . महिमा   6 .   ईशित्‍व , वाशित्‍व   7 .   सर्वकामावसायिता   8 .   सर्वज्ञत्‍व   9 .   दूरश्रवण   10 .   परकायप्रवेशन 11 .   वाक्सि

मां ब्रम्हकचारिणी की कथा 2020


 

शास्‍त्रो के अनुसार पूजा विधान 

मॉं ब्रम्‍हचारिणी -  नवरात्रि के दूसरे दिन मॉं ब्रम्‍हचाहिणी की उपासना ये शैलपुत्री के बाद जो देवी का स्‍वरूप स्थित है उसकी उपासना है ब्रम्‍ह का अर्थ यहॉं पर तप से है इनकी उपासना से तप ,  त्‍याग , वैराग्‍य ,  सदाचार और संयम की व्‍यक्ति बढ़ता है मॉं दुर्गा के भक्‍तो को शुभ फल देने बाली है www.jankarimy.com


ब्रम्‍हचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली करने वाली । देवी का रूप अत्‍यंत भव्‍य और पूर्ण ज्‍योतिर्मय है इनके बाएं हॉथ में कमण्‍डल ओर दॉएं हॉंथ में माला है।


शैलपुत्री ही जब नारद जी के अनुसार बताए अनुसार शिव जी को पति रूप में प्राप्‍त करने के लिये तप करने के लिये जंगल में जाती है भगवान शिव को पति रूप में प्राप्‍त करने के लिए वो घोर तपस्‍या करती है जब वे घोर तपस्‍या करती है तब उनका नाम तपश्र्चारिणी अर्थात ब्रम्‍हचारिणी नाम अभिहित किया गया । एक हजार वर्ष तक उन्‍होने केवल फल फूल खाकर बिताए और सौ वर्ष तक केवल जमीन पर रह कर शाक पर निर्वाह किया।


कुछ दिनों तक कठिन उपवास किये खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप अनेको घोर कष्‍ट सहे उसके बाद तीन हजार वर्ष तक उन्‍होने बेल पत्र खाकर बिताए और फिर बेल पत्र खाना ही बंद कर दिया , इसके बाद निराहार और निर्जला व्रत रहकर कई हजार वर्ष बिताए पत्‍तों को खाने छोड़ देने के कारण उनका नाम अपर्णा पड़ गया।


एैसी कठिन तपस्‍या करने कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया । सभी देवता , ऋषि  ,  मुनि सभी ने ब्रम्‍हचारिणी की तपस्‍या को अभूतपूर्व पुण्‍य क्रत्‍य बताया ,  सराहना की कहा की हे देवी आज तक किसी ने एैसा कठोर तप नहीं किया । यह तुम्‍ही कर सकती थी तुम्‍हें चंद्रमौलि शिवजी अवस्‍य प्राप्‍त होंगे। अब तपस्‍या छोड़कर घर लौट जाओ जल्‍द ही तुम्‍हारे पिता तुम्‍हे लेने आऐंगे।

 

इस देवी की कथा का सार यह है की जीवन के कठिन समय में भी कभी विचलित नहीं हाना चाहिए। मां ब्रम्‍हचारिणी की क्रपा से सभी मनोरथ की प्राप्ति होती है मॉं दुर्गा की उपासना के दूसरे दिन देवी के इसी स्‍वरूप की पूजा होती है ।  


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